यूनिवर्सिटी नेटवर्क फार ह्यूमन राइट्स की डूब प्रभावितों के लिए रिपोर्ट, बांध के गेट न खोलने और अन्य पक्षों पर कड़ा रुख. सरकारी अत्याचार और गंभीर उल्लंघन का आरोप.

[via News Leaders] यूनिवर्सिटी नेटवर्क फार ह्यूमन राइट्स की डूब प्रभावितों के लिए रिपोर्ट, बांध के गेट न खोलने और अन्य पक्षों पर कड़ा रुख. सरकारी अत्याचार और गंभीर उल्लंघन का आरोप.

न्यूज़ लीडर्स, विशेष रिपोतार्ज़

सरदार सरोवर बांध के जल स्तर को लेकर अमेरिका में स्थित यूनिवर्सिटी नेटवर्क फार ह्यूमन राइट्स ने एक रिपोर्ट जारी कर भारत सरकार को खरी खोटी सुनाई है।

रिपोर्ट में सरदार सरोवर बांध के भरे जाने से उत्पन्न स्थिति को लेकर लिखा है कि यह आदिवासी समुदायों के खिलाफ भारत सरकार का अत्याचार दर्शाता हैं। रिपोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भारत के कानून और अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकारों के तहत जो आदिवासी समुदायों को दायित्व दिये गये है, का भारत सरकार गंभीर उल्लंघन कर रहा है।

यूनिवर्सिटी नेटवर्क ने अपनी रिपोर्ट में सिफारिश कि है की भारत सरकार सरदार सरोवर के गेट खोंले और बांध के जल स्तर को कम करके 122 मीटर तक लाऐ और तब तक खुला रखें जब तक भारत सरकार अपने संवैधानिक और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के दायित्व का पालन कर उक्त परियोजना से प्रभावित होने वाले परिवारों की पहचान कर मुआवजा देकर उनका पुनर्वास करे। उल्लेख है कि बांध के भरने से जलमग्न क्षेत्रों को चिन्हित कर पीड़ितजनों का ध्यान रखे।

रिपोर्ट प्रभावितों का पक्ष लेते हुऐ कहती है कि, सरदार सरोवर बांध में पानी भरने से हुए जलमग्न क्षेत्र में बढ़ते जल स्तर के बावजूद भारत सरकार ने सरदार सरोवर बांध के गेट खोलने से इंकार किया है। जिसके कारण अब हजारों परिवार अपने घरों, भूमि और आजीविका के विनाश का इंतजार कर रहे हैं। इन में से कई परिवारों का पुनर्वास या पर्याप्त मुआवजा भी नहीं मिला हैं।

यूनिवर्सिटी नेटवर्क ने एक वृतचित्र भी बनाया है..

यूनीवर्सिटी नेटवर्क फॉर ह्यूमन राइट्स की और से रिपोर्ट के साथ एक तीन मिनट की डाॅक्यूमेंटरी (वृतचित्र) भी पेश की है। जिसकी शुरुआत 17 सितम्बर 2017 को देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने जन्मदिन पर इस परियोजना को राष्ट्र को समर्पित करते हुए दिखाऐ गऐ है।

उक्त डाॅक्यूमेंटरी में प्रभावितजनों को अपनी स्थानीय भाषा में समस्या और जमीन डूबने के लिऐ चिंतित दिखाया है। मानवाधिकार के लिए कार्य कर रही संस्था ने कहा है कि यह लघु फिल्म सरदार सरोवर बांध से प्रभावित, मानवीय परिणामों और भारत सरकार की और से विस्थापित परिवारों को पर्याप्त रूप से मुआवजा न देना और अधूरे पुनर्वास की असफलता को दर्शाती है।

संस्था कहती है कि यह रिपोर्ट प्रभावित क्षेत्रों में कई हफ़्तों की यात्राओं और बांध के पानी से डूबने के खतरे में रहने वाले आदिवासी समुदायों के साथ इंटरव्यूों पर आधारित है।

रिपोर्ट में भारत सरकार और बांध अधिकारियों के चार तरह के अत्याचार ..

1)- जलमग्न क्षेत्रों में प्रभावित परिवारों को हटाने के लिए उनके घरों को ध्वस्त करने की धमकियां और उत्पीड़न का सरकार और अधिकारियों ने इस्तेमाल किया। जबकि प्रभावितजनों के मुआवजे और पुनर्वास अधूरे है और नये घरों के लिए भूमि और धन राशी नहीं मिली तथा अस्थाई घरों में जाने के लिए विवश किया जा रहा है।

2)- सरकार और अधिकारी बांध के जलमग्न क्षेत्र में आदिवासी समुदायों के पारंपरिक भूमि अधिकारों को पहचानने में व्यवस्थित रूप से असफल रहे। इस वजह से जिन परिवारों के पास बरसों से अपनी पैतृक कृषि भूमि के लिए औपचारिक कागजात नहीं थे। उन्हे अपनी इस डूबने-वाली भूमि के लिए मुआवजे की मांग से वंचित किया गया।

3)- सरकार और अधिकारियों ने मनमाने ढंग या गलती से इस परियोजना प्रभावित व्यक्तियों की सूची में कई परिवारों के नाम छोड़ दिऐ थे। उनके पास अपनी डूबी हुई या डूबने वाली ज़मीन के स्वामितत्व पत्र होने के बावजूद मुआवजा नहीं मिल पाया है।

4)- भूमि के लिए भूमि मिलने के बजाय सरकार ने मुआवजे के लिए पैसे देने का निश्चय कर कई आदिवासी परिवारों को अकेले भूमि खरीदने के लिए विवश कर दिया हैं। जिसके कारण कई परिवार जो पीढ़ियों से एक साथ रहते थे। वह अलग अलग हो गऐ।

सरदार सरोवर बांध भारत सरकार के गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान राज्यों की दशकों पूरानी परियोजना है। यह भारत की सबसे बड़ी और पांचवीं नदी, अर्थात् नर्मदा परियोजना है जो विद्युत उत्पादन एवं देश के निर्जल पश्चिमी हिस्से की कृषि भूमि को सिंचित करने के लिए बनाई गई है। इस परियोजना के पक्ष में ऐसा प्रचारित किया जाता है।

परन्तु परियोजना से होने वाले नुकसान और हाशिए पर चले जाने वाले पीड़ितजनों के बारे में कुछ भी नहीं कहा जाता है। जिनके त्याग पर खड़ी की जा रही यह नदी परियोजना है। वर्तमान में जिस भीषण त्रासदी का सामना प्रभावित परिवार कर रहे है। उसे हर क्षण हर पल महसूस करना केवल पीड़ित परिवार के बस की ही बात है और ऐसे समय में सब कुछ छीन जाने पर भी सरकारें और जन नेताओं की चुप्पी असहनीय है। धन्य है यह मानवाधिकार की संस्था, जिसने इतनी गंभीरता से पीड़ितजनों के बारे में कम से कम सोचा तो सही।

"यूनिवर्सिटी नेटवर्क फार ह्यूमन राइट्स"
संस्था के बारे में संक्षिप्त जानकारी..
मानव अधिकारों के लिए कार्यरत विश्वविद्यालय नेटवर्क,

'यूनिवर्सिटी नेटवर्क फॉर ह्यूमन राइट्स देश भर के विश्वविद्यालयों में स्नातक छात्रों को सीखने और उन्हें मानवाधिकार तथ्य, प्रलेखन में सदैव संलग्न होने के अवसर प्रदान करता है जो सीधे प्रभावित समुदायों की आवाज़ों को केंद्र में रखता है और सामाजिक न्याय आंदोलनों का समर्थन करता है।'

Ruhan Nagra